ख़ुद से जो आज तक हुआ ना रूबरू…
ख़ुद से जो आज तक हुआ ना रूबरू…
इश्क़ का हाल वो सुना रहे हैं क्यूँ…
सुना रहे हैं क्यूँ…
सुना रहे हैं क्यूँ…
ख़ुद से जो आज तक हुआ ना रूबरू…
आइना देखकर भी उलझा हुआ
साये को साज़िशें बता रहे हैं क्यूँ
दिल की गलियों से गुज़रे नहीं कभी
रास्ते फिर नए बना रहे हैं क्यूँ
ख़ुद से जो आज तक हुआ ना रूबरू…
ख़ुद से जो आज तक हुआ ना रूबरू…
इश्क़ का हाल वो सुना रहे हैं क्यूँ…
सुना रहे हैं क्यूँ…
जो दिलों की सदी से गुज़रे नहीं
ख़्वाब आँखों में वो सजा रहे हैं क्यूँ
दर्द की आग में जले भी नहीं
राख चेहरे पे फिर लगा रहे हैं क्यूँ
ख़ुद से जो आज तक हुआ ना रूबरू…
ख़ुद से जो आज तक हुआ ना रूबरू…
इश्क़ का हाल वो सुना रहे हैं क्यूँ…
सुना रहे हैं क्यूँ…
हर जवाब अधूरा सा लगता यहाँ
सवाल ज़िंदगी से बचा रहे हैं क्यूँ
जिस सफ़र का पता नहीं ख़ुद उन्हें
उस सफ़र पर हमें बुला रहे हैं क्यूँ
हक़ीक़त से नज़रें चुरा रहे हैं क्यूँ…
चुरा रहे हैं क्यूँ…
चुरा रहे हैं क्यूँ…
दिल की आवाज़ दबा रहे हैं क्यूँ…
दबा रहे हैं क्यूँ…
दबा रहे हैं क्यूँ…
ख़ुद से जो आज तक हुआ ना रूबरू…
ख़ुद से जो आज तक हुआ ना रूबरू…
इश्क़ का हाल वो सुना रहे हैं क्यूँ…
सुना रहे हैं क्यूँ…
ख़ुद से जो आज तक हुआ ना रूबरू…
इश्क़ का हाल वो सुना रहे हैं क्यूँ…
सुना रहे हैं क्यूँ…
~ राजेश कुट्टन ‘मानव’

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