सफ़र का सच

मैं उम्र भर किसी मंज़िल में हूँ, मगर कोई रास्ता नहीं है
ये पाँव चलते रहे सदा, पर कहीं भी ठिकाना बना नहीं है

जहाँ से लौटा था ख़्वाब लेकर, वहाँ से उम्मीद फिर से जागी
ये दिल भी अजीब मुसाफ़िर है, जो टूटा है पर थका नहीं है

हर एक चेहरे में ढूँढा ख़ुद को, मगर अजनबी सा ही पाया
ये आइना भी गवाह है कि मैं वैसा कभी रहा नहीं हु

जो सच बताने लगे हैं मुझको, वो ख़्वाब अब रास आते नहीं
ये देख कर भी मैं चुप रहा कि कोई भी सपना सना नहीं है

तू अपनी नींदों को बेच देता है, बस कुछ पल चैन पाने को
मगर सुकून का सौदा करने से सुकून कभी मिला नहीं है

जो राह रोशन थी कल तलक, उसी में अँधेरा उतर आया
ये सफ़र का सच है, इसमें कोई साथी सदा रहा नहीं है

~ राजेश कुट्टन ‘मानव’


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