बहुत तहों में दबा है, हिसाब निकालना है
जो रह गया है रगों में, तेज़ाब निकालना है
ये उम्र बैठी हुई है किसी पुराने मलबे पर
मुझे समय के तले से शबाब निकालना है
मैं अपने साथ कई बंद कमरों में रहता हूँ
किसी दरार से पहला गुलाब निकालना है
ये जिस्म वर्षों से पहने हुए हैं मेरी साँसें
अब इन लिबासों से मेरा नक़ाब निकालना है
न जाने किसने मेरे नाम पर धुआँ लिख दिया
मुझे उस आग से अपना जवाब निकालना है
मैं अपनी पीठ पे ढोता रहा हूँ बीते मौसम
इस गर्द से कोई भूला निशान निकालना है
कई बरस हुए आईनों ने सच नहीं बोला
किसी निगाह से मेरा हिजाब निकालना है
बहुत दिनों से कोई मुझमें जागता है चुपचाप
मुझे इस नींद से उसका ख़्वाब निकालना है
मैं एक कहानी के अँधे कुएँ में गिरा हुआ हूँ
अब इस अँधेरे से अपना आफ़ताब निकालना है
~ राजेश कुट्टन ‘मानव’

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