जनम-जनम की प्यास — राधा का विरह
जनम-जनम मैं बाट निहारूँ, श्याम मोरे…
नैनन सूं बहे यमुना, प्यास न बुझी मोरे…
इस जनम बिरहा सह लूं सांवरिया,
अगले जनम भी नाम तिहारो ही धरो रे…
कदंब तले जो वादा कीन्हो, भूल गए काहे मोहन…
मुरली की वो टेर सुनी थी, अब क्यूँ लागे रोवन…
रात गही मैं दीप जलाई, बाती जली प्राणन सी,
आवो एक बार श्याम, बन जाऊँ धूल चरणन की…
मोरे श्याम… मोरे श्याम…
प्राणन में बसो घनश्याम…
मोरे श्याम… मोरे श्याम…
प्राणन में बसो घनश्याम…
ब्रज की गलियन पूछें मुझसे, “श्याम कहाँ रे राधे?”
हर श्वास में तेरो नाम जपूँ, पर न मिले वो साधे…
चुनर मेरी भीगी-भीगी, नैनन की बरसात में,
तन सूखो रे, मन डूबो रे, तेरी ही हर बात में…
जोगन बन डोलूं साँवरिया,
तुम बिन सूना धाम…
जोगन बन डोलूं साँवरिया,
तुम बिन सूना धाम…
कहवे कोई “राधे भूल जा”, कैसे भूलूँ मोहन…
रग-रग में जो रमे हो तुम, कैसे काटूँ जीवन…
इस जनम की प्यास अधूरी, ले चलूँ संग अपने,
फिर जनम में मिलो अगर तुम, पूछूँ न कोई सपने…
जनम-जनम की ये प्यास, चरणन में धर जाऊँ,
तुम मिलो या न मिलो श्याम, नाम तिहारो गाऊँ…
राधा रहे न रहे जग में,
प्रेम तिहारो रह जाऊँ…
Rajesh Kuttan

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