कोई बात जो उभरी थी आँखों में,
वो अब लफ्ज़ों से डरती है।
जैसे कोई ख्वाब आधा जिया हो —
और आधा… नींद की तह में दफ़न हो गया हो।
तू मिला भी, तो उस तरह नहीं मिला
जैसे मिलते हैं लोग…
तू रुका भी, तो उस वक़्त नहीं रुका
जब ठहराव की सबसे ज़रूरत रही।
आज भी जब शाम की परछाइयाँ
खिड़की पर दस्तक देती हैं,
लगता है —
वक़्त तुझसे चुपचाप मिलकर आया हो।
मेरी हर ख़ामोशी में इक कोना ऐसा है
जहाँ तू अब भी अपना नाम छोड़ गया है।
मैं तुझे पुकारता नहीं —
बस अपने आस-पास तुझे टटोल लेता हूँ,
जैसे तू अब भी कहीं हवा में गूंजता हो,
और मैं अब भी अधूरा हूँ — उस बात की तरह जो कभी कही नहीं गई।
~ राजेश कुट्टन ‘मानव’

Leave a comment