हमने जो की थी मोहब्बत—वो नींव, वो इमारत आज भी है,
तेरे नाम की ख़ुशबू में दिल की पहली राहत आज भी है।
तेरी ज़ुल्फ़ की छाँह तले जो ख्वाब पले थे चुपके से,
बरसों बाद भी पलकों पर उनकी नर्म आदत आज भी है।
बीती रात के सन्नाटे में तेरी आहट जैसा कुछ,
कानों में रुक-रुक आती है—कैसी यह इनायत आज भी है।
रक़्स-ए-ख़याल में तू ही तू, बाकी सब हट जाते हैं,
इन आँखों की बेईमानी में थोड़ी-सी शराफ़त आज भी है।
जिस मोड़ पे तुझको छोड़ा था, ख़ुद से वहाँ मिलना सीखा,
उस हिज्र की धूप-छाँव में रहने की क़ाबिलीयत आज भी है।
तेरे पत्र की सूखी स्याही उँगली पर लग जाती है,
हर अक्षर के पीछे छुपी एक मीठी शिकायत आज भी है।
कुछ सच हमने बचपन जैसे बक्सों में रख छोड़े थे ‘मानव’,
उन्हीं खिलौनों की चोटों में कच्ची-सी अमानत आज भी है।
जो बात कभी कहनी थी, होंठों तक आकर रुक जाती,
दिल की तह में तह-दर-तह उसकी कोई हिकायत आज भी है।
तू चाहे तो लौट भी सकता—दरवाज़ा खुला रख छोड़ा,
तुझको दिल तोड़ जाने की वैसी ही इजाज़त आज भी है।
~ राजेश कुट्टन ‘मानव’

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