तुम्हारा नाम लेते ही
मैं खुद के पास आता हूँ
भटकता हूँ जहाँ भी मैं
वहीं से लौट आता हूँ
न जाने कौन सा रिश्ता
है इस आवाज़ का मुझसे
तुम्हें जब भी पुकारूँ मैं
ज़रा बेहतर हो जाता हूँ
ये कैसा रास्ता है
जो भीतर खुलता जाता है
मैं जितना दूर जाता हूँ
उतना करीब आता हूँ
तुम्हारा नाम लेते ही
मैं खुद के पास आता हूँ
तुम कोई शख़्स हो शायद
या मेरा ही पता हो तुम
कई चेहरे मिले लेकिन
कोई अपना नहीं निकला
मगर इक नाम ऐसा था
जो मुझमें घर बना बैठा
न मंदिर में, न मस्जिद में
न दुनिया की सरायों में
जहाँ भी खुद को ढूँढा है
वहाँ तेरा निशाँ निकला
ये कैसी रौशनी है
जो चुपके से उतरती है
मैं आँखें बंद करता हूँ
तो दुनिया मुस्कुराती है
तुम्हारा नाम लेते ही
मैं खुद के पास आता हूँ
तुम कोई शख़्स हो शायद
या मेरा ही पता हो तुम
अगर तुम ख़्वाब हो तो भी
हक़ीक़त से ज़्यादा हो
अगर तुम दूर हो फिर भी
मेरी धड़कन में रहते हो
मैं खुद से जब बिछड़ता हूँ
तुम्हीं आकर मिलाते हो
तुम्हारा नाम शायद
मेरी रूह का आईना हो
तुम्हारा नाम लेते ही
मैं खुद के पास आता हूँ
तुम्हारा नाम लेते ही
मैं खुद के पास आता हूँ
न मंज़िल, न सफ़र कोई
न कोई और तमन्ना है
तुम्हारा नाम लेते ही
मैं खुद के पास आता हूँ
~ राजेश कुट्टन ‘मानव’

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