इश्क़ में तू हिसाब रखती है
बेशुमार बेहिसाब रखती है
लिखती है जिस पर
मेरे हर मुस्कान के पल
लम्हे जिनमे गुजरे वो हसीन कल
उन पन्नो में छुपा लेती है
मेरे रुके हुए हर अश्क़
छाप लेती है जैसे
उम्र भर का अक्स
याद कर कर के जपती है
हर दरगाह में ढूढ़ती है
मुझे प्रसाद में बांध कर
रुमाल में रखती है
इश्क़ में तू हिसाब रखती है
बेशुमार बेहिसाब रखती है
मेरी सुबह भी लिखे
मेरी शाम भी लिखे
वो कैनवास में अपनी
मेरी गर्द साँसे भी खिंचे
फिर उन्ही पन्नो को
मुट्ठी में भिंचे
रोक रोक के पूछती है
हर नक़ाब में ढूढ़ती
मुझे गुलाब में बांध कर
किताब में रखती है
इश्क़ में तू हिसाब रखती है
बेशुमार बेहिसाब रखती है
मानव

Leave a comment