कहते हैं, एकतरफ़ा प्यार भी एक रिलेशनशिप होता है
खुद से निभाओं या उसे, फिर भी दिल में तो होता है
अकेला मैं चल रहा था, तेरा साथ बस ख़यालों में
ख़याल भी टूट जाए, तो कितना दर्द होता है
कितनी मुश्किल थी हर वो रसम, जब तू ही इनकार में थी
फिर भी नाम के रिश्ते में ख़ुद को बँधे रहना होता है
तोड़ना था इक वादा, जो शायद दोनों ने जिया न कभी
फिर भी खाली हाथों में उसका बोझ रखना होता है
आज दशकों बाद यह समझ आया, मैं अब आज़ाद हूँ
बिना शिकवा-शिकायत के, खुलकर साँस लेना भी होता है
“मानव” कहो या कुछ भी, अब नाम से फ़र्क़ नहीं पड़ता
यादों के बाज़ार में भी आख़िर ख़ुद को बचाए रखना होता है
~ राजेश कुट्टन ‘मानव’

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