ब्रह्मा की मुट्ठी से गिरी एक दमकती साँस,
जिसे किसी नाम की ज़रूरत नहीं थी—
फिर भी उसे अहल्या कहा गया,
मानो सौंदर्य को भी किसी शिकारी का मोहर चाहिए।
उसका जन्म—
नियति नहीं, निर्माण था।
ईश्वर ने उसे स्त्री नहीं,
एक पुरस्कार गढ़ा था—
जिसे देखने वाले की आँखें
उसकी आत्मा से पहले उसका चेहरा पढ़ें।
गौतम के आश्रम में
पत्तों की सरसराहट भी तप का हिस्सा थी।
वहाँ स्पर्श पाप था,
मुस्कान दंड,
और इच्छा—
एक ऐसा अपराध
जिसका न्याय केवल पुरुष कर सकते थे।
अहल्या की साँसें
सूखे कूँए की तरह थीं—
गहरी,
खाली,
और किसी के आवाज़ डालने की प्रतीक्षा में।
इन्द्र आया—
देवताओं का मुखिया,
पर भीतर से उतना ही प्यासा
जितना वह संसार
जो स्त्री को केवल देह समझता है।
वह छल बनकर आया,
पर अहल्या को छल
पहली बार देखा जाना लगा।
वह क्षण—
सही या गलत नहीं,
बस जीवित होने की एक झलक थी।
पर दोष हमेशा वही उठाती है
जिसके हाथ में सत्ता नहीं होती।
गौतम के शाप में
घृणा से अधिक
अधिकार का नशा था।
पत्थर बनाना
सज़ा नहीं,
शून्य में धकेलना था—
जहाँ न शब्द बचते हैं,
न आँखें,
न कोई प्रमाण
कि कभी कोई स्त्री
यहाँ साँस लेती थी।
वह चट्टान नहीं बनी—
वह मिटाई गई।
इतिहास की दरारों में
कैद एक आवाज़,
जिसकी चीख
काल के गले में अटककर
सुनाई देना बंद हो गई।
फिर राम आए—
धर्म का ध्वज लिए हुए।
उनका स्पर्श
मुक्ति नहीं,
बस कब्ज़े का नया हस्तांतरण था।
जिसने उसे रोशन किया,
उसी ने उसे फिर एक कथा बना दिया—
एक ऐसी कथा
जहाँ स्त्रियाँ कभी स्वयं
उठकर नहीं चलतीं,
बस पुरुषों के आशीर्वाद से
दोबारा साँस लेती हैं।
अहल्या ने पुनर्जन्म नहीं पाया—
उसकी कहानी ने पाया।
वह फिर भी वहीं रही,
एक अदृश्य दहलीज़ पर—
जहाँ स्त्री का हर अपराध
उसे शरीर से नहीं,
अस्तित्व से वंचित कर देता है।
कभी सोचो—
क्या घाव इतने गहरे हो सकते हैं
कि स्मृतियाँ भी उनसे डर जाएँ?
अहल्या वही प्रश्न है।
एक अनकहा तूफ़ान,
जिसे पुरुषों ने लिख दिया—
औरत की तरह नहीं,
बल्कि संपत्ति की तरह।
वह पत्थर नहीं,
एक अधूरी विद्रोह-चीख थी
जिसे दुनिया ने शांति कहकर
मंदिर में स्थापित कर दिया।
~ राजेश कुट्टन ‘मानव’

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