तेरी मुट्ठी में बंद कोई रेत नहीं जो फिसल जाऊँ,
मैं एहसास-ए-मोहब्बत हूँ, तेरे ज़हन में उतर जाऊँ।
तेरी ख़ामोशियों के भी मैं राज़ सुन लेता हूँ,
तेरे होंठ कुछ न कहें, मैं लफ़्ज़ों में बिखर जाऊँ।
मुझे खोकर भी तेरा दिल मुझे ढूँढता रहेगा,
मैं आईना हूँ, तेरी आँखों में नज़र आऊँ।
तेरी साँसों में महक बनके ठहर सकता हूँ,
तेरी धड़कन की लय में भी मैं लिपट जाऊँ।
तेरे अश्कों में भी इक उजाला भर सकता हूँ,
तेरी वीरानियों में गुलाब सा महक जाऊँ।
ना वक़्त की मार, ना दूरी मुझे मिटा पाए,
मैं तेरा लम्हा नहीं, सदियों तक ठहर जाऊँ।
तेरे तन्हा सफ़र में भी साथ चलता रहूँ,
तेरे साये की तरह हर मोड़ पे नज़र आऊँ।
तू चाहे भूल भी जाए मेरी पहचान को,
मैं तेरे ख्वाब की सिलवटों में उतर जाऊँ।
तू जुदाई की दुआ भी करे तो क्या होगा,
मैं दुआ बनके तेरे लबों से गुजर जाऊँ।
तेरी मुट्ठी में बंद कोई रेत नहीं जो फिसल जाऊँ,
मैं एहसास-ए-मोहब्बत हूँ, तेरे ज़हन में उतर जाऊँ।
~ राजेश कुट्टन ‘मानव’

Leave a reply to Dr Garima tyagi Cancel reply