तू फिर से मिलने आ जाना

जब शाम भी थक जाए, और रात ठहर जाए,
मैं साँस रोक लूँगा, तू ख़्वाब बन के आ जाना।

जब अपने नाम से भी लगने लगे गुरेज़,
तू एक नर्म पुकार बन, दिल में उतर आना।

जब आईना भी चेहरा पहचानने से डरे,
उस मोड़ पे तुम अपना धूप लेकर आ जाना।

जब रौशनी का मतलब सिर्फ़ जलना रह जाए,
तुम चाँदनी की तरह, मेरे दर्द में छा जाना।

जब हर तरफ़ सन्नाटे को आवाज़ गूंजे,
तू मेरी ख़ामोशी में अपना गीत गा जाना।

और जब थक जाऊँ मैं ख़ुद को ढूँढते हुए,
बस एक दफ़ा तुम फिर से मिलने आ जाना।

~ राजेश कुट्टन ‘मानव’


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2 responses to “तू फिर से मिलने आ जाना”

  1. Rakesh Kuttan Avatar

    और जब थक जाऊँ मैं ख़ुद को ढूँढते हुए,

    बस एक दफ़ा तुम फिर से मिलने आ जाना।

    माशाल्लाह

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    1. Rajesh Kuttan Avatar

      धन्यवाद!

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