जब शाम भी थक जाए, और रात ठहर जाए,
मैं साँस रोक लूँगा, तू ख़्वाब बन के आ जाना।

जब अपने नाम से भी लगने लगे गुरेज़,
तू एक नर्म पुकार बन, दिल में उतर आना।

जब आईना भी चेहरा पहचानने से डरे,
उस मोड़ पे तुम अपना धूप लेकर आ जाना।

जब रौशनी का मतलब सिर्फ़ जलना रह जाए,
तुम चाँदनी की तरह, मेरे दर्द में छा जाना।

जब हर तरफ़ सन्नाटे को आवाज़ गूंजे,
तू मेरी ख़ामोशी में अपना गीत गा जाना।

और जब थक जाऊँ मैं ख़ुद को ढूँढते हुए,
बस एक दफ़ा तुम फिर से मिलने आ जाना।

~ राजेश कुट्टन ‘मानव’

2 responses to “तू फिर से मिलने आ जाना”

  1. और जब थक जाऊँ मैं ख़ुद को ढूँढते हुए,

    बस एक दफ़ा तुम फिर से मिलने आ जाना।

    माशाल्लाह

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प्रतिशोध की अग्नि में जन्मा यह काव्य, शक्ति नहीं—स्मृति की राजनीति रचता है। यह कथा है उस पराजित पुरुष की, जिसने युद्ध तलवार से नहीं, इतिहास की दिशा मोड़कर लड़ा। महाकाव्य पूछता है—यदि विजेता बदल जाए, तो धर्म का चेहरा कौन तय करेगा?.

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इतिहास केवल विजेताओं द्वारा लिखा गया दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि पराजितों की राख में दबी हुई एक दूसरी पुस्तक भी होती|

प्रतिशोध की अग्नि में जन्मा यह काव्य, शक्ति नहीं—स्मृति की राजनीति रचता है। यह कथा है उस पराजित पुरुष की, जिसने युद्ध तलवार से नहीं, इतिहास की दिशा मोड़कर लड़ा। महाकाव्य पूछता है—यदि विजेता बदल जाए, तो धर्म का चेहरा कौन तय करेगा?