हर आईना मेरा ही अक्स लिए फिरा,
मैं था, पर मैं न था — कुछ अधूरा सा रहा।
रास्ते सब मिरे नाम से मशहूर हुए,
मगर मैं ही सफ़र में कहीं छूटा सा रहा।
लब खामोश थे, पर रूह कुछ कहती रही,
कोई नग़्मा था जो भीतर ही टूटा सा रहा।
वो जिसे मैं खुदा समझ बैठा कई बार,
वो तो मेरे ही अंदर छुपा बैठा रहा।
मैंने देखा था ताज महलों के भीतर,
दिल का एक कोना सदा सूना सा रहा।
अब न कुछ पाने की ख़्वाहिश, न डर है,
इश्क़ में जल गया फिर भी बुझा सा रहा।
~ राजेश कुट्टन ‘मानव’

Leave a reply to Rajesh Kuttan Cancel reply