हर आईना मेरा ही अक्स लिए फिरा,
मैं था, पर मैं न था — कुछ अधूरा सा रहा।

रास्ते सब मिरे नाम से मशहूर हुए,
मगर मैं ही सफ़र में कहीं छूटा सा रहा।

लब खामोश थे, पर रूह कुछ कहती रही,
कोई नग़्मा था जो भीतर ही टूटा सा रहा।

वो जिसे मैं खुदा समझ बैठा कई बार,
वो तो मेरे ही अंदर छुपा बैठा रहा।

मैंने देखा था ताज महलों के भीतर,
दिल का एक कोना सदा सूना सा रहा।

अब न कुछ पाने की ख़्वाहिश, न डर है,
इश्क़ में जल गया फिर भी बुझा सा रहा।

~ राजेश कुट्टन ‘मानव’

2 responses to “ख़ुद से ख़ुद तक का सफर”

  1. अब न कुछ पाने की ख़्वाहिश, न डर है,

    इश्क़ में जल गया फिर भी बुझा सा रहा।

    बेहतरीन शेर

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प्रतिशोध की अग्नि में जन्मा यह काव्य, शक्ति नहीं—स्मृति की राजनीति रचता है। यह कथा है उस पराजित पुरुष की, जिसने युद्ध तलवार से नहीं, इतिहास की दिशा मोड़कर लड़ा। महाकाव्य पूछता है—यदि विजेता बदल जाए, तो धर्म का चेहरा कौन तय करेगा?.

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इतिहास केवल विजेताओं द्वारा लिखा गया दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि पराजितों की राख में दबी हुई एक दूसरी पुस्तक भी होती|

प्रतिशोध की अग्नि में जन्मा यह काव्य, शक्ति नहीं—स्मृति की राजनीति रचता है। यह कथा है उस पराजित पुरुष की, जिसने युद्ध तलवार से नहीं, इतिहास की दिशा मोड़कर लड़ा। महाकाव्य पूछता है—यदि विजेता बदल जाए, तो धर्म का चेहरा कौन तय करेगा?