मैं एक अल्फ़ाज़ से भीगे हुए लम्हे की तलाश में हु —
जहाँ बारिश सिर्फ़ मौसम नहीं, बल्कि जज़्बात का मौसम बन जाए,
और ‘तुम’ की गर्मी, ‘मैं’ की नमी में मिलकर इश्क़ का भीगा-संकेत दे जाए।
जहां नमी, जज़्बा और एक भीगी हुई तन्हाई का अहसास हो।
मैं ख़ुद को रख आया था इक बूँद के भीतर,
मैं धूप में था फिर भी बदन भीगता रहा।
तेरी गर्म साँसें मुझे छू के गुज़रती रहीं,
मैं आँसुओं में भी पसीने सा जलता रहा।
नज़दीकियों की तलब में बहुत दूर निकला,
तेरे ही साये में ख़ुद को गुम करता रहा।
तेरा नाम बिन पुकारे मेरी रगों में था,
जैसे बारिश से पहले कोई मौसम डरता रहा।
मैं बूँद में था, तू साँस में — मगर फिर भी,
इश्क़ इन दोनों के दरमियाँ बहता रहा।
हाथ भीगते रहे, छाँव में तपिश थी बहुत,
हम दोनों में एक दरार थी जो बढ़ता रहा।
~ राजेश कुट्टन ‘मानव’

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