मैं एक अल्फ़ाज़ से भीगे हुए लम्हे की तलाश में हु —
जहाँ बारिश सिर्फ़ मौसम नहीं, बल्कि जज़्बात का मौसम बन जाए,
और ‘तुम’ की गर्मी, ‘मैं’ की नमी में मिलकर इश्क़ का भीगा-संकेत दे जाए।
जहां नमी, जज़्बा और एक भीगी हुई तन्हाई का अहसास हो।


मैं ख़ुद को रख आया था इक बूँद के भीतर,
मैं धूप में था फिर भी बदन भीगता रहा।

तेरी गर्म साँसें मुझे छू के गुज़रती रहीं,
मैं आँसुओं में भी पसीने सा जलता रहा।

नज़दीकियों की तलब में बहुत दूर निकला,
तेरे ही साये में ख़ुद को गुम करता रहा।

तेरा नाम बिन पुकारे मेरी रगों में था,
जैसे बारिश से पहले कोई मौसम डरता रहा।

मैं बूँद में था, तू साँस में — मगर फिर भी,
इश्क़ इन दोनों के दरमियाँ बहता रहा।

हाथ भीगते रहे, छाँव में तपिश थी बहुत,
हम दोनों में एक दरार थी जो बढ़ता रहा।

~ राजेश कुट्टन ‘मानव’

3 responses to “मैं बूँद में था”

  1. collectivehard5ddd0dfb74 Avatar
    collectivehard5ddd0dfb74

    ati sunder

    Like

Leave a comment

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Get the Book

प्रतिशोध की अग्नि में जन्मा यह काव्य, शक्ति नहीं—स्मृति की राजनीति रचता है। यह कथा है उस पराजित पुरुष की, जिसने युद्ध तलवार से नहीं, इतिहास की दिशा मोड़कर लड़ा। महाकाव्य पूछता है—यदि विजेता बदल जाए, तो धर्म का चेहरा कौन तय करेगा?.

Be Part of the Movement

Every week, Rajesh shares new blogs, fresh perspectives, and creator spotlights—straight to your inbox.

Go back

Your message has been sent

Warning

इतिहास केवल विजेताओं द्वारा लिखा गया दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि पराजितों की राख में दबी हुई एक दूसरी पुस्तक भी होती|

प्रतिशोध की अग्नि में जन्मा यह काव्य, शक्ति नहीं—स्मृति की राजनीति रचता है। यह कथा है उस पराजित पुरुष की, जिसने युद्ध तलवार से नहीं, इतिहास की दिशा मोड़कर लड़ा। महाकाव्य पूछता है—यदि विजेता बदल जाए, तो धर्म का चेहरा कौन तय करेगा?