आया मगर रुकना न आया.

आना आया उसे बारहा मेरी ओर,
पर रुकने का कोई हुनर न आया।

मैं हर दफ़ा रोशन रहा उसके लिए,
पर शायद दिल का असर न आया।

कई बहानों से लौटी थी वो मुझ तक,
मगर एक भी सच में सफ़र न आया।

मैंने कुछ तो रखा होगा दिल में उसके,
जो लौटी — मगर फिर भी घर न आया।

उसके जाने पे रोया मैं बेहिसाब,
पर उसे मेरी ख़ामोशी नज़र न आया।

क़ुसूर मेरा भी था शायद कुछ ऐसा,
जो ठहरने का हक़ उसे गर न आया।

अब जो मिलती है ख़्वाब में वो बेवजह,
लगता है इश्क़ में मंज़र न आया।

~ राजेश कुट्टन ‘मानव’


Discover more from RAJESH KUTTAN

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

One response to “आया मगर रुकना न आया.”

  1. collectivehard5ddd0dfb74 Avatar
    collectivehard5ddd0dfb74

    jabarjast

    Liked by 1 person

Leave a reply to collectivehard5ddd0dfb74 Cancel reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.