आना आया उसे बारहा मेरी ओर,
पर रुकने का कोई हुनर न आया।

मैं हर दफ़ा रोशन रहा उसके लिए,
पर शायद दिल का असर न आया।

कई बहानों से लौटी थी वो मुझ तक,
मगर एक भी सच में सफ़र न आया।

मैंने कुछ तो रखा होगा दिल में उसके,
जो लौटी — मगर फिर भी घर न आया।

उसके जाने पे रोया मैं बेहिसाब,
पर उसे मेरी ख़ामोशी नज़र न आया।

क़ुसूर मेरा भी था शायद कुछ ऐसा,
जो ठहरने का हक़ उसे गर न आया।

अब जो मिलती है ख़्वाब में वो बेवजह,
लगता है इश्क़ में मंज़र न आया।

~ राजेश कुट्टन ‘मानव’

One response to “आया मगर रुकना न आया.”

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    collectivehard5ddd0dfb74

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प्रतिशोध की अग्नि में जन्मा यह काव्य, शक्ति नहीं—स्मृति की राजनीति रचता है। यह कथा है उस पराजित पुरुष की, जिसने युद्ध तलवार से नहीं, इतिहास की दिशा मोड़कर लड़ा। महाकाव्य पूछता है—यदि विजेता बदल जाए, तो धर्म का चेहरा कौन तय करेगा?.

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इतिहास केवल विजेताओं द्वारा लिखा गया दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि पराजितों की राख में दबी हुई एक दूसरी पुस्तक भी होती|

प्रतिशोध की अग्नि में जन्मा यह काव्य, शक्ति नहीं—स्मृति की राजनीति रचता है। यह कथा है उस पराजित पुरुष की, जिसने युद्ध तलवार से नहीं, इतिहास की दिशा मोड़कर लड़ा। महाकाव्य पूछता है—यदि विजेता बदल जाए, तो धर्म का चेहरा कौन तय करेगा?