तुम्हारी लिबास में मेरी प्यास क्यों है
हु अगर दरिया तो दिल में आग क्यों है
थक भी जाएं तो कदम मेरे कदम
उठते है हर बार तेरी तलाश में क्यों है।

हर शय में है नक्काशी तुम्हरे नयन की
फिर हर चेहरे से झाँकता तू क्यों है
बुझ भी जाएं तो आँखे मेरी आँखे
जलते है हर बार तेरी उम्मीद में क्यों है

इन अंधेरों को मेरी आदत क्यों है
हु अगर चिराग तो घर मे मातम क्यों है
लौट भी जाये गर पूछ कर पता मेरा पता
मिलता है हर बार तु मेरी महफ़िल में क्यों है।

राजेश कुट्टन ‘मानव’

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प्रतिशोध की अग्नि में जन्मा यह काव्य, शक्ति नहीं—स्मृति की राजनीति रचता है। यह कथा है उस पराजित पुरुष की, जिसने युद्ध तलवार से नहीं, इतिहास की दिशा मोड़कर लड़ा। महाकाव्य पूछता है—यदि विजेता बदल जाए, तो धर्म का चेहरा कौन तय करेगा?.

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इतिहास केवल विजेताओं द्वारा लिखा गया दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि पराजितों की राख में दबी हुई एक दूसरी पुस्तक भी होती|

प्रतिशोध की अग्नि में जन्मा यह काव्य, शक्ति नहीं—स्मृति की राजनीति रचता है। यह कथा है उस पराजित पुरुष की, जिसने युद्ध तलवार से नहीं, इतिहास की दिशा मोड़कर लड़ा। महाकाव्य पूछता है—यदि विजेता बदल जाए, तो धर्म का चेहरा कौन तय करेगा?