तुम्हारी लिबास में मेरी प्यास क्यों है
हु अगर दरिया तो दिल में आग क्यों है
थक भी जाएं तो कदम मेरे कदम
उठते है हर बार तेरी तलाश में क्यों है।
हर शय में है नक्काशी तुम्हरे नयन की
फिर हर चेहरे से झाँकता तू क्यों है
बुझ भी जाएं तो आँखे मेरी आँखे
जलते है हर बार तेरी उम्मीद में क्यों है
इन अंधेरों को मेरी आदत क्यों है
हु अगर चिराग तो घर मे मातम क्यों है
लौट भी जाये गर पूछ कर पता मेरा पता
मिलता है हर बार तु मेरी महफ़िल में क्यों है।
राजेश कुट्टन ‘मानव’

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