ज़बर लिखना भी बड़ा मुश्किल होता है | हर वक़्त खुद को होशियार साबित करना हमेशा आसान नहीं | खुद के लिए लिखना शुरू किया, फिर जाने किस माया में उलझ गए के चालाकी ने अपना पंजा कसा और हुनर में जंग लगना चालू हो गया |
सोचना विचारणा अपने आप में ही जटिल कार्य है, उसके साथ उसको तराशना, सारे बिन्दुओ को आपस में जोड़ना और फिर लिखना, यह तो किसी साधारण व्यक्ति के युद्ध क्षत्र में आता ही नहीं है | साधारण सिर्फ सोच ही ले वही अपने आप में एक सम्पूर्ण व्यवस्ता है | हाथ से मुँह तक की दौड़ ही थका देती है, सारा शरीर का खून तो बस पैरो को ज़मींन में रोक के रखने में खर्च हो जाता है, मस्तिष्क को सक्रीय करने के लिए कुछ नहीं बचता |
संसार बड़ा विचित्र है, हम यहां आज़ाद होने आते है पर पैदा होते है बंधनो में बंध जाते है | इस मृत्युलोग की परिकल्पना, आत्मा नाम की ऊर्जापुंज को रफ़्तार प्रधान करने के लिए किया गया है ताकि वो अपने अंतिम गंतव्य (परमात्मा) तक पहुँच सके; पर यह संसार किसी मायावी की तरह खेल दिखा कर हम को व्यस्त रखता है| हम उलझे हुए रहते है उसके खेल में और पता ही नहीं चलता के कब अपनी ऊर्जा खपा दिए और खो गए अनंत चकर्व्य में , जो एक आसान सा सफर था उसे हम कठिन कर चले |

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