Chapter 1
जब हमारे हाथों में आँकड़े होते हैं,
कानून की मोटी किताबें,
और आवाज़ इतनी साफ़
कि दीवारें भी सुनने लगें—
उसी क्षण
हम सबसे अधिक असहाय होते हैं।
क्योंकि शक्ति
हमारे भीतर नहीं,
हमारे चारों ओर जमा हो जाती है—
मेज़ों पर, मंचों पर,
प्रस्तावों और प्रस्तावनाओं में।
हम खड़े तो होते हैं,
पर अपने ही फैसलों की छाया में,
इतने सीधे
कि झुकने की कला भूल जाते हैं।
हम बहुत दूर आ चुके हैं—
गाँव से शहर तक,
भूख से बहस तक,
डर से तर्क तक—
पर हर दूरी
हमारे भीतर की दूरी को
और लंबा करती चली गई।
हर उपलब्धि
एक नया अकेलापन लेकर आई।
हर मंज़िल ने
किसी पुराने साथी को
पीछे छोड़ दिया।
हम भीड़ में रहते हैं,
पर साक्षी अकेले होते हैं।
सच जब सामने आता है
तो तालियाँ नहीं,
खामोशी मिलती है।
हमने सीख लिया है
मुस्कुराकर सहना,
सभ्य भाषा में चुप रहना,
और इसे ही
परिपक्वता कहना।
लेकिन रात के उस क्षण में—
जब न पद काम आता है,
न पहचान,
न यात्रा की थकान कोई गवाही देती है—
तब हम जानते हैं
कि जितना आगे आए हैं,
उतना ही
अकेले हो गए हैं।
तो बताओ—
अगर सबसे मज़बूत होने की कीमत
यह अकेलापन है,
तो क्या हम सच में मज़बूत हैं
या बस बहुत देर से
डर को समझ पाए हैं?
~ राजेश कुट्टन ‘मानव’
Chapter 2
तलाश की त्रासदी
हम जिसे ढूँढते रहे
वह अक्सर चमकता हुआ था—
शीशे जैसा साफ़,
शीर्षक जैसा छोटा,
और इतना आसान
कि उसे पाने के बाद
कोई सवाल न बचे।
हमने उसे सफलता कहा,
पहचान,
सुरक्षा—
और कभी-कभी
ईश्वर भी।
पर जो हमें चाहिए था
वह कभी चमका नहीं।
वह चुपचाप
हमारे भीतर पड़ा रहा—
जैसे कोई भूली हुई भाषा
जिसे बोलने में
शर्म आती हो।
हमें चाहिए था
किसी का बिना शर्त रुक जाना,
किसी का हमारे डर को
नाम दिए बिना समझ लेना,
किसी का यह कह देना—
“तुम पर्याप्त हो,”
बिना किसी प्रमाण के।
लेकिन हम
प्रमाणों के शहर में जीते रहे।
जहाँ हर चीज़
मापी जाती है,
तौली जाती है,
और फिर
कचरे की तरह फेंक दी जाती है।
हमने जो खोजा
वह हमें भीड़ में ले गया।
जो हमें चाहिए था
वह हमें
अपने पास बैठने को कहता था।
यही त्रासदी है—
कि हमारी प्यास
हमारी भूख को पहचानती नहीं।
हम शोर माँगते रहे
जब हमें
खामोशी चाहिए थी।
और जब ज़रूरत
दरवाज़े पर आई,
हमने उसे पहचाना नहीं—
क्योंकि वह
विज्ञापन जैसी नहीं थी।
तो कहो—
यह विफलता हमारी तलाश की थी,
या उस समझ की
जो हमें कभी सिखाई ही नहीं गई?
~ राजेश कुट्टन ‘मानव’
Chapter 3
भ्रम का सत्य
ख़ुशी
हमारे जीवन में
झिलमिलाकर आती है—
जैसे किसी दूर जाती रेल में
अचानक जल उठा
एक डिब्बे का दीया।
हम हाथ हिलाते रह जाते हैं,
और अँधेरा
अपनी जगह
शांत भाव से बैठा रहता है।
अँधेरा कभी आता नहीं,
वह पहले से होता है।
वह प्रतीक्षा नहीं करता,
कोई घोषणा नहीं करता—
बस हमारे साथ
साँस लेता है।
हम भूल जाते हैं
जो पास है
उसे स्थायी मान लेना
सबसे बड़ी भूल है।
माँ की आवाज़,
रोज़ की रोटी,
किसी का बिना पूछे
हमारे नाम से पुकार लेना—
ये सब
हमें इतने सामान्य लगते हैं
कि इनके जाने की
तैयारी ही नहीं करते।
रोशनी
हमेशा मेहमान रही है।
त्योहारों की तरह,
तालियों की तरह,
प्रेम की पहली पंक्ति की तरह—
आती है,
थोड़ी देर ठहरती है,
और फिर
हमारे भरोसे को
शर्मिंदा छोड़कर चली जाती है।
लेकिन अकेलापन—
वह कहीं नहीं जाता।
वह हमारे साथ
बिस्तर लगाता है,
हमारे प्रश्न सुनता है,
और हर रात
हमारे सिरहाने
ईमानदारी से बैठा रहता है।
वह हमें
झूठे दिलासे नहीं देता।
बस आईना रख देता है—
और कहता है,
“अब देखो।”
शायद इसलिए
ख़ुशी हल्की है
और खालीपन भारी।
एक झिलमिल है,
दूसरा सत्य।
तो बताओ—
अगर रोशनी मेहमान है
और अकेलापन साथी,
तो हम जीवन भर
किसका स्वागत करते रहे
और किससे
आँखें चुराते रहे?
~ राजेश कुट्टन ‘मानव’
Chapter 4
न जानने की विद्या
ज्ञान
उत्तर नहीं है—
वह प्रश्न सहने की क्षमता है।
जो कहता है
“मैं जानता हूँ,”
वह अक्सर
सबसे पहले रुक जाता है।
क्योंकि रुकना
सुविधाजनक होता है—
चलते रहना
खतरनाक।
जानना
किताबों में जमा नहीं होता,
डिग्रियों की अलमारियों में
नहीं टिकता।
वह तो
हर उत्तर के बाद
एक नया संदेह छोड़ जाता है—
जैसे कोई शिक्षक
जिसकी सबसे बड़ी शिक्षा
उसकी चुप्पी हो।
हम सीखते हैं
तथ्यों को याद करना,
पर भूल जाते हैं
अज्ञान को स्वीकार करना।
और यही वह क्षण है
जहाँ ज्ञान
अहंकार में बदल जाता है।
सच्चा जानना
पीछे लौटने की कला है—
अपने ही विश्वासों से,
अपने ही निष्कर्षों से।
यह मान लेना
कि जो स्पष्ट लगता है
वह अधूरा है,
और जो पूर्ण लगता है
वह भ्रम हो सकता है।
ज्ञान
दीपक नहीं,
अँधेरा है—
जो हमें दिखाता है
कि कितना कुछ
अब भी अदृश्य है।
और जब कोई कहे—
“मैं कुछ नहीं जानता,”
तो समझ लेना
वह पहली बार
सीखना शुरू कर रहा है।
तो बताओ—
यदि जानने का अर्थ
अपने न जानने से मिलना है,
तो हम किस डर से
ज्ञान को
सिर्फ़ संग्रह बनाते रहे
यात्रा क्यों नहीं?
~ राजेश कुट्टन ‘मानव’
Chapter 5
भीड़ के भीतर
जब आग लगी,
तो सबसे पहले
भीड़ इकट्ठा हुई।
इतनी आँखें थीं वहाँ
कि किसी एक आँख को
देखने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी।
हर कोई किसी और की ओर देखता रहा—
कोई आगे बढ़ेगा,
कोई बोलेगा,
कोई ज़िम्मेदारी लेगा।
और ज़िम्मेदारी
भीड़ में
इतनी पतली हो गई
कि अंततः
ग़ायब हो गई।
हम अकेले में डरपोक नहीं होते,
हम भीड़ में
निर्दोष हो जाते हैं।
इतने निर्दोष
कि किसी की चीख
सिर्फ़ शोर लगने लगती है।
फिर
हमने सीखा
साथ चलना।
साथ सोचना।
साथ चुप रहना।
जो बात ग़लत लगी,
उसे भी
सर हिलाकर
सही मान लिया—
क्योंकि अलग खड़ा होना
सबसे महँगा अपराध है।
भीड़ ने हमें
एक सुकून दिया—
कि अगर सब ग़लत हैं
तो कोई अकेला
दोषी नहीं होगा।
और कुछ चेहरे—
वे चेहरे
जो मुस्कुराते थे,
सुंदर थे,
या मीठी भाषा जानते थे—
हमने उन्हें
सच का प्रमाण मान लिया।
हमने मान लिया
कि जो आकर्षक है
वह ईमानदार होगा,
जो नरम है
वह निर्दोष होगा।
हमने प्रमाण नहीं माँगे—
हमने प्रभाव को
चरित्र समझ लिया।
यही सबसे सुरक्षित धोखा है—
जब विवेक
सम्मति में बदल जाए,
और सच
लोकप्रियता से तय हो।
तो पूछो—
अगर भीड़ हमें
निष्क्रिय बनाती है,
सहमति हमें
अंधा करती है,
और प्रभाव हमें
भ्रम में रखता है—
तो संकट के उस क्षण में
जब कोई नहीं बढ़ता,
क्या हम सब निर्दोष होते हैं
या बस
बहुत सुविधाजनक रूप से
ग़ायब?
~ राजेश कुट्टन ‘मानव’
Chapter 6
मन की साज़िशें
हमारे भीतर
एक अदृश्य चिकित्सक बैठा है—
जो बिना दवा
आराम दे देता है।
हम विश्वास का नाम बदल देते हैं,
और पीड़ा
आज्ञाकारी हो जाती है।
कभी-कभी
खाली गोली भी
काम कर जाती है—
क्योंकि मन
अपने ही झूठ को
इतनी श्रद्धा से मान लेता है
कि शरीर
विरोध करना भूल जाता है।
फिर
हम मंच पर आ खड़े होते हैं—
अपने हर शब्द,
हर चूक,
हर हिचक
को प्रकाश में नहाया हुआ मानते हुए।
हमें लगता है
सारी दुनिया
हमारी ओर देख रही है।
लेकिन दुनिया—
अपने ही आईनों में उलझी है।
वह हमारे लड़खड़ाने को
नोटिस नहीं करती,
क्योंकि वह
अपने गिरने की चिंता में व्यस्त है।
और फिर
हम सोचते हैं।
नहीं—
हम वही सोचते हैं
जो पहले से सोचते आए हैं।
हम प्रमाण नहीं ढूँढते,
हम पुष्टि ढूँढते हैं।
जो बात हमें सही लगती है
उसे सच बना लेते हैं,
और जो सच असहज है
उसे
चुपचाप नज़रअंदाज़ कर देते हैं।
हम तथ्यों को
अपनी मान्यताओं के साँचे में ढालते हैं,
और फिर गर्व से कहते हैं—
“देखो, सबूत!”
यही मन की सबसे सुरक्षित चाल है—
वह हमें
ठीक होने का एहसास देता है
बिना ठीक हुए,
दिखने का डर देता है
बिना देखे गए,
और समझने का भ्रम देता है
बिना सुने।
तो बताओ—
अगर हमारा विश्वास
हमें ठीक भी कर सकता है
और अंधा भी,
अगर दुनिया हमें देख ही नहीं रही
फिर भी हम डरते हैं,
और अगर हम वही मानते हैं
जो मानना चाहते हैं—
तो क्या हम सच को खोजते हैं
या बस
अपने ही भ्रमों की
देखभाल करते हैं?
~ राजेश कुट्टन ‘मानव’
Chapter 7
अधूरापन और परिवर्तन
स्मृति
कोई तिजोरी नहीं
जहाँ घटनाएँ जस की तस
रखी रहती हों।
वह हर बार
खुलते ही
कुछ बदल देती है—
रंग, क्रम,
और कभी-कभी
दोष भी।
हम जब याद करते हैं,
तो सच को नहीं—
अपनी सुविधा को
दोहराते हैं।
बीता हुआ
हर बार
नया वर्तमान बनकर लौटता है,
और हम उसे
पहचान कर भी
अनजान बने रहते हैं।
कुछ बातें
पूरी नहीं होतीं—
अधूरे वाक्य,
छूटे हुए वादे,
कहे बिना रह गए प्रश्न।
वे हमारे भीतर
लगातार दस्तक देते रहते हैं,
जैसे कोई दरवाज़ा
जिसे बंद करना
हम टालते रहे हों।
पूरा हुआ काम
शांत हो जाता है।
अधूरा
हमें चैन नहीं लेने देता।
वह स्मृति नहीं—
एक दबाव है,
जो हमें
फिर से लौटने पर
मजबूर करता है।
और फिर भी
हम बदलते हैं।
धीरे-धीरे,
बिना घोषणा के।
पुरानी आदतें
दरकने लगती हैं,
नए रास्ते
मन के भीतर
अपनी जगह बना लेते हैं।
मस्तिष्क
पत्थर नहीं है—
वह नदी है।
जिसे मोड़ा जा सकता है,
जिसे नई दिशा दी जा सकती है,
अगर हम
बहाव से डरना छोड़ दें।
यही सबसे अजीब सत्य है—
कि जो हम याद करते हैं
वह स्थिर नहीं,
जो अधूरा है
वह हमें चलाता है,
और जो हम हैं
वह अंतिम नहीं।
तो पूछो—
अगर स्मृति बदलती रहती है,
अधूरापन हमें आगे धकेलता है,
और स्वयं को बदलना संभव है—
तो हम किस डर से
अपने पुराने संस्करण को
अंतिम सच मानकर
पकड़े बैठे हैं?
~ राजेश कुट्टन ‘मानव’
Chapter 8
काबू करना सीख लिया?
भावनाएँ
हमारे भीतर
कोई व्यवस्था नहीं बनातीं—
वे दरारें खोलती हैं।
ईर्ष्या
हमें दूसरे से नहीं,
अपने अधूरेपन से मिलवाती है।
ग्लानि
किए गए अपराध से नहीं,
उस सच से जन्म लेती है
जिसे हमने पहचान लिया
पर निभाया नहीं।
और प्रेम—
वह सबसे जटिल है।
वह हमें
किसी और में नहीं,
अपने जोखिम में ले जाता है।
जहाँ खोने की संभावना
ही
निकटता की कीमत होती है।
हम भावनाएँ
नियंत्रित नहीं करते।
हम उन्हें
सभ्य बनाते हैं।
नाम देते हैं,
सीमाएँ खींचते हैं,
ताकि वे
हमारे ऊपर
सत्ता न बना लें।
जो कहता है
“मैंने सब काबू में कर लिया,”
वह अक्सर
सबसे डरा हुआ होता है।
क्योंकि भावनाओं पर
जीत नहीं होती—
सिर्फ़
संवाद होता है।
हम उन्हें दबाते हैं,
तो वे
रोग बन जाती हैं।
हम उन्हें खुला छोड़ देते हैं,
तो वे
हिंसा बन सकती हैं।
इसलिए
मानव होना
संतुलन नहीं—
सतत संघर्ष है।
अपने भीतर
उस आग के साथ जीना
जो रोशनी भी देती है
और जला भी सकती है।
तो बताओ—
अगर भावनाएँ
हमारी कमज़ोरी नहीं,
हमारी गहराई हैं,
तो क्या हम
उन्हें जीतने की कोशिश में
खुद को
समझना भूल गए हैं?
~ राजेश कुट्टन ‘मानव’

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