हम बहुत पहले मर गए थे—
उस दिन
जब युधिष्ठिर ने सत्य को
पासे की मेज़ पर
रख दिया था।
भीष्म तब भी जीवित थे,
पर शरशय्या
उनके भीतर उग आई थी—
कर्तव्य के काँटों से भरी,
जहाँ इच्छा को
लेटने की जगह
कभी नहीं मिली।
हम वही हैं—
जो हस्तिनापुर की सभा में
आँखें झुकाए बैठे रहे,
जब प्रश्न को
वस्त्र की तरह
खींचा जा रहा था।
डर ने हमें
द्रोण की तरह सिखाया—
कि शस्त्र विद्या
आत्मा से ऊपर है,
और लालच ने
एकलव्य की उँगली
फिर से माँगी—
इस बार बिना गुरु के।
हम आज भी
अश्वत्थामा हैं—
जो अपराध के बाद
अमर होना चाहता है,
ताकि प्रायश्चित
कभी पूरा न करना पड़े।
परिवर्तन से काँपते नहीं हम—
हम अर्जुन की तरह
धनुष उठाते हुए
काँपते हैं,
क्योंकि सामने
शत्रु नहीं,
अपने ही
आदर्श खड़े हैं।
कृष्ण आज भी रथ पर हैं,
पर हम सुनना नहीं चाहते—
क्योंकि गीता
तभी कठिन लगती है
जब वह
सुविधा के विरुद्ध
बोलती है।
हम भविष्य को
अभिमन्यु की तरह
चक्रव्यूह में भेजते हैं—
ज्ञान दिए बिना,
और फिर
उसकी मृत्यु पर
शोकगीत रचते हैं।
लालच ने हमें
दुर्योधन बना दिया—
जो जानता था
राज्य किसका है,
पर यह नहीं समझ पाया
कि भूख
कभी तृप्त नहीं होती।
डर ने हमें
कर्ण जैसा उदार बनाया—
पर केवल तब,
जब माँगने वाला
हमसे कुछ
छीन न सकता हो।
हम मिट्टी में धँसे
आकाश से उत्तर माँगते रहे,
जैसे गंगा से
पवित्रता माँगता हुआ
वही समाज
जो उसके किनारे
लाशें छोड़ आता है।
मनुष्य का पतन
किसी युद्ध में नहीं हुआ—
वह हर उस क्षण गिरा
जब उसने
विदुर की चुप्पी चुनी,
और विद्रोह से
मुँह मोड़ लिया।
अब हम साँस लेते हैं,
पर आत्मा
वनवास में है।
और डर—
वह हमारे भीतर
राजा नहीं,
परमात्मा बन बैठा है।
~ राजेश कुट्टन ‘मानव’

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