— स्मृति के सामने निर्वस्त्र
ये आँसू व्यर्थ नहीं,
बस ऐसे हैं जिनका कोई उपयोग नहीं।
न वे प्रार्थना बनते हैं,
न विद्रोह।
वे केवल गिरते हैं—
जैसे समय अपनी ही छाया पर थूक दे।
मैं रोता नहीं किसी के लिए,
मैं रोता हूँ उस क्षण के लिए
जो लौटना जानता ही नहीं।
वह जो हँसी में छुपा था,
जो आवाज़ में अधूरा था,
जो जीवित रहते ही
इतिहास में बदल गया।
ये आँसू भविष्य से नहीं डरते,
भविष्य बहुत ईमानदार होता है—
वह आने से पहले ही
अपने धोखे बता देता है।
डर तो अतीत का है,
जो मीठा बोलता है
और पीठ में छुरा
मुस्कराकर छोड़ जाता है।
मैं उन चेहरों पर रोता हूँ
जो अब स्मृति नहीं,
बस आदत हैं।
जिन्हें भूलना संभव था,
पर भुलाया नहीं गया—
क्योंकि कुछ पीड़ाएँ
पहचान बन जाती हैं।
ये आँसू किसी मृत देह पर नहीं,
वे उस जीवित शून्य पर गिरते हैं
जो हमारे भीतर
आराम से साँस लेता है।
वह जगह
जहाँ कभी विश्वास था,
अब केवल शिष्टाचार है।
समय यहाँ नदी नहीं,
यह एक कसाई है—
जो बीते हुए को
धीरे-धीरे
इतना सुंदर काटता है
कि हम उसके लिए
कृतज्ञ हो जाते हैं।
मैं रोता हूँ
उन वचनों पर
जो निभाए नहीं गए,
और उन सच्चाइयों पर
जो निभा दिए गए।
दोनों ही समान रूप से
निर्दयी थीं।
ये आँसू
न किसी को दोष देते हैं,
न किसी से न्याय माँगते हैं।
वे जानते हैं—
दुनिया को दुख नहीं चाहिए,
केवल कथाएँ चाहिए
जहाँ अंत साफ़ हो।
पर मेरा अंत गंदा है।
मेरी स्मृति धुँधली नहीं,
अत्यंत स्पष्ट है—
और यही दंड है।
ये आँसू व्यर्थ नहीं,
बस बहुत देर से पैदा हुए हैं।
वे उस समय के लिए हैं
जब सब कुछ संभव था
और किसी ने कहा—
“अभी नहीं।”
और अब—
अब बहुत देर हो चुकी है।
~ राजेश कुट्टन ‘मानव’

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