रात ने जब अपने कण्ठ खोलकर मेरे नाम पर ताले जड़े, मैं निशब्द खड़ा था— धूल, राख और पराजय की बरसात में, मानो शरद्वान के शाप से घायल कोई धनुर्धर अग्नि की तृष्णा लिए पृथ्वी पर भटक रहा हो।
मेरी पीठ पर पड़े घाव किसी कृष्णद्वैपायन वृत्तांत का अंतिम चरित लगते, पर हृदय में अब भी तिर रहा है वह अव्यक्त अंशुमान— जो नष्ट होकर भी अपनी तपस्वी ज्योति नहीं खोता।
मैंने युद्धभूमि में शल्य के विस्मृत रथ की चरमराती लकड़ी में अपने भविष्य की आहट सुनी, जहाँ हार का पत्थर सिर्फ अगली विजय का औजार बनता है।
शब्दों के भीतर छिपी रहस्यवाली ज्वाला का स्वाद मैंने आपदेव के निर्जन वन में चखा था, जहाँ वीरता अभिशप्त ऋषि-कुल की तरह पीढ़ियों के पार अपना पाप ढोती है— पर फिर भी झुकती नहीं।
मेरा रक्त आज भी गन्धर्व-निशाओं के संगीत की तरह गरम है, जिसमें ताड़ित नागकन्याओं की फुँफकारें एक तपस्वी गीत का भार उठाए चलती हैं।
तुम पूछोगे— हार के बाद भी हृदय में यह नील अग्नि क्यों जलती है? मैं कहूँगा— क्योंकि मैं वह बृहदश्रवा नहीं जो अपमान से मर जाए, मैं वह यवनाश्व हूँ जिसकी नाभि में देवताओं ने फिर से जन्मने का आशीर्वाद बोया था।
प्रेम भी मेरे भीतर कवचक-कुंडल की तरह अमिट और पुरखों द्वारा चढ़ाया गया है, वह प्रेम—जो अभिमन्यु की श्वास जैसा मृत्यु में भी अधूरा लड़ता है।
तुम्हारे अचिन्हित स्पर्शों ने मेरी नसों में पाण्डु की व्याधि की तरह अन्यतम गति भर दी— जहाँ स्पंदन का हर उतार मुझे प्रणय और पराक्रम दोनों की याद दिलाता रहा।
मेरे भीतर का योद्धा आज विराट रूप में नहीं, बल्कि अल्पज्ञात, मौन, सत्यव्रती शिखंडी-धैर्य में दिखता है— जो अपनी देह से अधिक अपने संकल्प की ध्वजा को बचाता है।
रक्त से भीगा यह धूसर मस्तक न समय से हारा है न नियति से— मैं वह भीमसेन नहीं जिसका बल सबको ज्ञात हो, मैं वह घटोत्कच भी नहीं जो रात में प्रलय बन जाए— मैं वह अलौकिक बलराम-शिष्य बब्बर योद्धा सत्राजित का धैर्य हूँ जो भले ही कथा में गौण है, पर अग्नि से जन्मा, अग्नि से पला, और अग्नि में फिर उठने की प्रतिज्ञा लिए जीवित रहता है।
मेरी देह का हर घाव जैसे वरुण की शपथ— कभी तट नहीं छोड़ने वाली। मैं अपने टूटे अस्त्रों को वसिष्ठ के निर्जीव आश्रम में सुखाता हूँ, जहाँ हवा भी पुराणों के परित्यक्त नाम फुसफुसाती है।
हार मेरे चरणों में केवल अल्पकालिक धूल है, और मैं धूल को गन्धक में बदल देना जानता हूँ— वह गन्धक जो तपे हुए योद्धा की पवन-शक्ति बनती है।
मेरे प्रेम की नदी बुद्धि से अधिक अग्नि से चलती है, और तुम्हारी स्मृति उलूपी के गीले घूँघट की तरह अनन्त रात्रि में चमकती रहती है।
मैंने देखा है— निर्णायक क्षण में भी अंधकार मुझे मोड़ नहीं पाता, क्योंकि मेरे भीतर श्रुतकर्मा-व्रत का पुराना वचन अब भी दीपक की तरह जलता है।
युद्ध मेरा पथ है, और प्रेम मेरी दिशा— दोनों मिलकर उस उल्कापात का निर्माण करते हैं जो आत्मा को चीरकर देह को पुनः दिव्य बनाता है।
आज, जब समस्त आकाश जवाला मूर्च्छा में झुका हुआ है, मैं फिर उठता हूँ— कुशस्थली के अभिशप्त रथ का अंतिम सारथी बनकर।
मैं लौटूँगा उस रणभूमि में जहाँ पराजय ने मुझे अपनी अंतिम साँस दी थी— और मैं उसी साँस से अपनी अगली विजय की प्रतिज्ञा गढ़ूँगा।
क्योंकि योद्धा वही जो अंधकार को अपना श्राद्ध बना दे, और पुनर्जन्म लेकर उसे ही अपनी तलवार की धार पर प्रतिबिम्बित कर दे।
मैं अजेय नहीं— पर मेरा संघर्ष अमर है। मैं विजयी नहीं— पर मेरी ज्वाला शाश्वत है। और मैं प्रेम में पूर्ण नहीं— पर उस अधूरेपन में ही मेरी सारी दिव्यता छिपी है।
मैं लौटूँगा। और लौटने की यह आह स्वयं समय के ढोल में अपना गर्जन भर देगी।
प्रतिशोध की अग्नि में जन्मा यह काव्य, शक्ति नहीं—स्मृति की राजनीति रचता है। यह कथा है उस पराजित पुरुष की, जिसने युद्ध तलवार से नहीं, इतिहास की दिशा मोड़कर लड़ा। महाकाव्य पूछता है—यदि विजेता बदल जाए, तो धर्म का चेहरा कौन तय करेगा?.
इतिहास केवल विजेताओं द्वारा लिखा गया दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि पराजितों की राख में दबी हुई एक दूसरी पुस्तक भी होती|
प्रतिशोध की अग्नि में जन्मा यह काव्य, शक्ति नहीं—स्मृति की राजनीति रचता है। यह कथा है उस पराजित पुरुष की, जिसने युद्ध तलवार से नहीं, इतिहास की दिशा मोड़कर लड़ा। महाकाव्य पूछता है—यदि विजेता बदल जाए, तो धर्म का चेहरा कौन तय करेगा?
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