जब अहं भस्म हुआ — तब प्रेम स्वयं प्रकट हुआ।

सूक्ष्मतम (अनंत का अपमान)

हम सोचते हैं—
हम विशाल हैं,
महान हैं,
सृष्टि के नायक,
निर्णय लेने वाले,
दिशा तय करने वाले,
जैसे हम ही ब्रह्मांड के
नाभि में बैठे विष्णु हों।

पर सच यह है—
हम तो उस धूल के कण से भी
सूक्ष्मतर कण हैं,
जो किसी गली के मोड़ पर
अनदेखा गिरता है
और पैरों के नीचे
बिना आवाज़
मसल दिया जाता है।

हमारा हर श्वास
एक विराट धरोहर पर
एक अपमान है—
इतने छोटे होकर भी
इतना गर्व,
इतनी हेकड़ी,
इतना दावा
कि हम ही सब कुछ हैं।

हम यह नहीं समझते—
हमारे भीतर कोशिकाएँ हैं,
उन कोशिकाओं में अणु,
अणुओं में परमाणु,
परमाणुओं में कण,
और उन कणों के भीतर
रिक्ति
खालीपन।
शून्य।

और हम?
हम उसी शून्य पर
झंडा गाड़कर
कहते फिरते हैं—
“मैं हूँ।”

क्या विडम्बना!

और सोचो—
हो सकता है
हम स्वयं किसी
विशाल प्राणी के
शरीर में तैरते
बैक्टीरिया हों,
जिसके लिए हमारी सभ्यता
बस एक हल्की-सी खुजली हो—
अनदेखी, अनसुनी,
बिना महत्व की।

और वह प्राणी?
वह भी किसी और
विशाल अनंत का
सूक्ष्म सड़ा हुआ अंश हो सकता है।
और यह क्रम?
अनंत।
ऊपर भी,
नीचे भी,
भीतर भी,
बाहर भी।
सभी जगह—
परत दर परत
जाल की तरह।

फिर भी हम
छाती ठोककर कहते हैं—
“मैं जानता हूँ।
मैं समझता हूँ।
मैं नियंत्रण में हूँ।”

क्या नियंत्रण?
किस पर?
किस समय?
किस स्तर पर?

जिस दिन हम मरेंगे—
हमारा नाम
किसी पत्थर पर भी
पूरा नहीं टिकेगा।
और ब्रह्मांड?
वह एक पलक भी
नहीं झपकाएगा।

हम सोचते रहे
हम देवता हैं—
जबकि हम तो
देवताओं के स्वप्न में उपजे
क्षणिक झाग
भर हैं।
जो लहर टूटते ही
वापस
नदी के गर्भ में
अनाम हो जाता है।

फिर भी
हमारे भीतर अहंकार
वैसे ही जलता है
जैसे रावण को लगा था
कि वह अमर है।

और अंत में—
हम भी लंका की तरह
स्वयं में ही
जल उठेंगे।
हवा भी नहीं पूछेगी
हमारा नाम।

सूक्ष्मतम से सीख

(पुराणों की राख में जला हुआ प्रकाश)

जब जाना
कि मैं न अर्जुन की धनुर्ध्वनि,
भीष्म की प्रतिज्ञा,
बस रणभूमि की
धूल का घुमड़ता एक कण हूँ—
तब मेरे भीतर
गर्व की महाभारत
शांत पड़ने लगी।

मैंने स्वयं को देखा—
ब्रह्मा की रचना का अक्षर,
शिव की जटाओं में बंधा गंगाप्रवाह,
केवल कण-कण में भटकता वह जप,
जिसे ऋषि भी सुनते हैं
और पत्थर भी।

मैं दौड़ता था
इंद्र की सभा में सिंहासन खोजने,
पर पाया—
मेरे भीतर का स्वर्ग भी क्षणभंगुर,
और नरक भी।
दोनों
अहम की छाया थे।

मैंने झुकना सीखा —
न भक्त की तरह,
न दीन की तरह —
बल्कि
हनुमान की भक्ति-शक्ति की तरह—
जहाँ सामर्थ्य
गर्व में नहीं,
समर्पण में खिलती है।

मैंने समझा—
हिरण्यकश्यप अमरता नहीं खोज रहा था,
वह नश्वरता से युद्ध कर रहा था।
और युद्ध
वह स्वयं से हार गया।

तब जाना—
मनुष्य का सबसे बड़ा अंधकार
अंधकार नहीं होता,
बल्कि
यह विश्वास कि
वह सूर्य है।

मैं सूक्ष्म हूँ।
सूक्ष्म से भी सूक्ष्म।
शायद अनंत के रोमकूप में छिपा
एक कंपन मात्र
और वह अनंत
किसी और के भीतर
और वह किसी और के भीतर—
अनादि, अनंत, अवर्णनीय।

तब
मेरे भीतर का अहं
राख हो गया—
और राख से
एक शांत दीप उगा।

अब
प्रेम मेरे भीतर
शबरी के बेर बनकर उगता है—
सच्चा,
मीठा,
बिना प्रतिदान की प्यास के।

अब
करुणा
मुझमें
सीता का धैर्य बनकर बैठती है—
न दिखती है,
पर संसार को
सहती है।

अब
मैं चलता हूँ
वैसे
जैसे नर्मदा बहती है—
धीमी,
गहरी,
चुप,
फिर भी अजेय।

क्योंकि
जब मैंने जाना
कि मैं केंद्र नहीं हूँ,
तभी
पहली बार
मैंने
ब्रह्मांड को स्पर्श किया।

~ राजेश कुट्टन ‘मानव’


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