तेरी यादों की बारिश में भींगता रहा हूँ मैं,
इस वीराने सफ़र में भी जलता रहा हूँ मैं।
तेरी आवाज़ के साये अब भी पुकारते हैं,
ख़ामोशी की दीवारों से टकराता रहा हूँ मैं।
ये सड़कें, ये चिराग़ाँ, ये धुँधली सी तस्वीरें,
हर मोड़ पे तेरा अक्स ही ढूँढता रहा हूँ मैं।
वो हँसी, वो नज़र, वो मोहब्बत के उजाले,
ख़्वाबों की तरह दिल भी सजाता रहा हूँ मैं।
तेरे जाने के डर ने तोड़ डाले हैं भीतर,
हर साँस को तुम्हारे नाम से जोड़ता रहा हूँ मैं।
कहाँ तक छुपाऊँ दिल के तूफ़ानों को, “मानव”,
हर अश्क से खुद का तमाशा बनाता रहा हूँ मैं।
~ राजेश कुट्टन ‘मानव’

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