राह मुश्किल है—साथ न दे पाए,
मेरी चालों का जाल ही ले ले,
मैं जो ख़ुद से भी हार गया हूँ आज,
मेरी ख़ामोशी मिसाल ही ले ले।
तेरी महफ़िल में क़द्र नहीं जिसकी,
मेरे हिस्से का मलाल ही ले ले,
नाम लिख देगा चेहरों के धुँधले पर,
मेरे आँसुओं का गुलाल ही ले ले।
जो बचा मुझमें रात के बादल-सा,
थोड़ी सी ठंडी छाँव ही ले ले,
मेरी रग-रग में जो आग बची आख़िर,
उसकी आख़िरी लौ ही ले ले।
मेरे दरवाज़े वक़्त ने जंग खाए,
कुंडी-ज़ंजीर का ज़वाल ही ले ले,
और कुछ तो नहीं है दाम में मेरे,
मेरी साँसों का ख़याल ही ले ले।
चल, तुझे अपनी हार भी सौंप दूँ,
जीत चाहिए? तो उलाह ही ले ले,
मैं फ़क़त एक सफ़र की ख़ामोशियाँ,
तू मेरी राह का राज ही ले ले।
~ राजेश कुट्टन ‘मानव’

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