आज की रात ठहर जाने दो,
बस यहीं पास ठहर जाने दो।
दिल के दरवाज़े खुले हैं अभी,
बात अधूरी है—कह जाने दो।
आज की रात ठहर जाने दो…
रूठा हुआ वक़्त है हथेलियों में,
रेत-सा चुपचाप बह जाने दो।
धड़कनों का शोर धीमा करके,
एक लम्हा पलकों पे रह जाने दो।
दिन तो सौ सौ टुकड़ों में बंटता,
रात को पूरा ही गह जाने दो।
जितनी दूरियाँ हैं नाम के पीछे,
इनको आज साँस में ढह जाने दो।
रूह की देहरी पे कुरनिश करना,
इश्क़ को बे-लफ़्ज़ समझ जाने दो।
कल की फ़िक्र आज मत छेड़ो,
जो है, उसी में निखर जाने दो।
उलझे हुए ख़्वाबों की गिरहें मत खोलो,
ये भी तो हमारी रब्त की सूरत हैं;
आँखों की नमी में जो चमक ठहरी है,
उसको दुआ बनकर बह जाने दो।
थाम लो साहिल—हवा तेज़ सही,
कश्तियों को पास ठहर जाने दो।
नाम ना लो जुदाई का अभी,
चंद साँसें और ठहर जाने दो।
मानव की इल्तिज़ा बस इतनी—
आज नहीं, कल सब कह जाने दो;
जो नहीं कह पाए उम्र भर भी,
आज की रात वही सह जाने दो।
~ राजेश कुट्टन ‘मानव’

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