कहूँ क्या

किताबों में दबा हुआ कोई पुराना ज़ख्म देखा,
अब उसे खोलूँ या चुप रहु — कहूँ क्या।

चेहरा हँसता है बस तमाशा दिखाने को,
हँसी में छुपा सच बताऊँ या जुल्म बता दूँ — कहूँ क्या।

जो लौ क़लम की थी, उसने मेरे ग़म सँजोए,
उसे बुझा दूँ, या किसी दुआ में जलाऊँ — कहूँ क्या।

रिश्तों की ऊँगली पकड़ कर चले थे कई,
किसे थामूँ, किसे छोड़ दूँ — किसे, कहूँ क्या।

जो बातें रह गई थीं अधूरी, वो धड़कन में हैं,
उन्हें मुख पर लाऊँ या रूह में सुला दूँ — कहूँ क्या।

वो शहर जहां दिखावा ही अब निवाला है,
घर ले आऊँ क्या, या ठहर कर चला जाऊँ — कहूँ क्या।

कभी अपना बना कर रखा था ख़्वाबों का सामान,
उनको बिखेर दूँ, या किसी मोड़ पर टाँग दूँ — कहूँ क्या।

तेरे नाम की खुशबू जब तक कपड़ों में रहे,
उसे संजोकर रखूँ या आग कर दूँ — कहूँ क्या।

कई बार टूटा हूँ, कई बार संभला भी हूँ,
असलियत छिपाऊँ या सबको बता दूँ — कहूँ क्या।

‘मानव’ जो बचा है, उसे जिया दूँ या मिटा दूँ—
बेचूँ नहीं, बाँधूँ नहीं, पर क्या करूँ — कहूँ क्या।

~ राजेश कुट्टन ‘मानव’


Discover more from RAJESH KUTTAN

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a comment

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.