किताबों की तहों में दबी स्याही का जो निशाँ था,
खुला तो किसी पुरानी सुबह का असर रह जाता है।
तेरे हाथ से गुज़री हर चीज़ में जो ख़ुशबू थी,
वो लौट कर आने को नहीं — पर किसी फुसफुसाहट में रह जाता है।
वो बातें जो कह न सकीं, पन्नों में छुप-छुप के,
हर विराम के साये में एक बिन कहा हुआ सवाल रह जाता है।
कभी जिसने वादा तोड़ा, राख में पाया उस वादे की आग,
जला कर भी किसी शाम का एक नाम रह जाता है।
तुम्हारी हँसी जो गुज़रती है गलियों में कहीं,
परछाईं मेरे दिन की खिड़की पर रह जाता है।
ख्वाब मैंने बुने थे रात की कमज़ोर मगर जुबाँ से,
कोई टुकड़ा राहत के साथ कहीं तनहा रह जाता है।
लौट कर भी जो नहीं आता, फिर भी लौटने का खयाल,
कभी-कभी किसी मोड़ पे बस इक ठहराव रह जाता है।
कहते हैं वक़्त हर घाव समेट देता है, मगर मैंने देखा,
कुछ घाव बरसों बाद भी किसी साँस के साथ रह जाता है।
मैं मिटा देता हूँ अक्सर अपनी हर निशानी को फिर भी,
कुछ शब्द, कुछ आवाज़ें मेरी खामोशी में़ रह जाती हैं।
जो गए तुम्हे छोड़ कर, उनसे भी प्यार कर लो ‘मानव’ ,
कुछ लोगो के होने का असर उम्र भर रह जाता है।
~ राजेश कुट्टन ‘मानव’

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