ये राह कहाँ जा के टिके — ये बताए बस वक़्त,
दिन किस समंदर में बहे — ये सुनाए बस वक़्त।


इक ख़्वाब है, इक ताब है, किसको गले दिल लगाए,
किसको सफ़र से काट दे — ये दिखाए बस वक़्त।
कब रौशनी आवाज़ बने, कब छाँव दुआ बन जाए,
किस आँसुओं को फूल करे — ये बनाए बस वक़्त।


तेरा-मेरा कहना सभी, काग़ज़ पे धड़कनों जैसे,
कौन-सा लफ़्ज़ सच ठहरे — ये बतलाए बस वक़्त।
दिल में जो ऊन उलझी है, किस सिलाई से सुलझेगी,
किस धागे को टूट पड़े — ये सिखाए बस वक़्त।


कल किस दरवाज़े पर हम, खड़े हो सजदा करें,
किस दर पर सन्नाटा रखे — ये बिठाए बस वक़्त।
किस चोंच पे दाने उतरें, किस शाख़ पे घोंसला हो,
किस तिनके को घर कह दें — ये बताए बस वक़्त।


कब प्यार दवा बन जाएगा, कब ज़ख़्म बना रह जाएगा,
किस नाम से ये दर्द पुकार — ये बतलाए बस वक़्त।
दिन सो जाए किस पल में, किस पल रात जगाएगी,
किस खामोशी बोल पड़े — ये सुनाए बस वक़्त।


‘मानव’ ये किस्मत की स्याही कब आईना बन जाए,
किस चेहरे पर सच्चा असर — ये दिखाए बस वक़्त।

~ राजेश कुट्टन ‘मानव’

Inspired by “EnyaOnly Time” Writer(s): Eithne Ni Bhraonain, Roma Ryan, Nicky Ryan

Only time

Who can say where the road goes

Where the day flows

Only time

And who can say if your love grows

As your heart chose

Only time

Who can say why your heart sighs

As your love flies

Only time

And who can say why your heart cries

When your love lies

Only time

Who can say when the roads meet

That love might be

In your heart

And who can say when the day sleeps

If the night keeps

All your heart

Night keeps all your heart

Who can say if your love grows

As your heart chose

Only time

And who can say where the road goes

Where the day flows

Only time

outro

Who knows

Only time

Who knows

Only time

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प्रतिशोध की अग्नि में जन्मा यह काव्य, शक्ति नहीं—स्मृति की राजनीति रचता है। यह कथा है उस पराजित पुरुष की, जिसने युद्ध तलवार से नहीं, इतिहास की दिशा मोड़कर लड़ा। महाकाव्य पूछता है—यदि विजेता बदल जाए, तो धर्म का चेहरा कौन तय करेगा?.

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इतिहास केवल विजेताओं द्वारा लिखा गया दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि पराजितों की राख में दबी हुई एक दूसरी पुस्तक भी होती|

प्रतिशोध की अग्नि में जन्मा यह काव्य, शक्ति नहीं—स्मृति की राजनीति रचता है। यह कथा है उस पराजित पुरुष की, जिसने युद्ध तलवार से नहीं, इतिहास की दिशा मोड़कर लड़ा। महाकाव्य पूछता है—यदि विजेता बदल जाए, तो धर्म का चेहरा कौन तय करेगा?