कभी दुआ, कभी सौदा, कभी बस एक तमाशा,
ये दिल की चीज़ भी किस क़दर बिकने लगी है।
किसी के हाथ में मिट्टी, किसी के हाथ में सोना,
एक ही चाँद की कीमत यहाँ बदलने लगी है।
जिससे सितारों का मेला लगा था आँखों में,
उसी के लिए वो चमक खिलौना बन गई है।
कोई तो उम्र भर सजाता रहा परछाईं,
किसी के लिए वही धूप भी ग़ैर बन गई है।
जिसे चराग़ समझा, वही तो राख निकला,
हवाओं की चाल अब और गहरी लगने लगी है।
कभी जो ख़्वाब था, अब नक़्श-ए-काग़ज़ है बस,
सियाही में डूबी हुई साँसें लिखने लगी हैं।
जिसे अमानत-ए-दिल समझ के थाम रखा था,
वो बात अब किसी बाज़ार में बोली जाने लगी है।
जिसे सजदे में रखा, वो नाम गिर गया यूँ,
कि जैसे दर पे रखी हुई मिट्टी उड़ने लगी है।
कोई तो रोज़ बनाता रहा अपना एक आलम,
किसी के लिए वो बस इक खेल लगने लगी है।
कभी दुआ, कभी सौदा, कभी बस एक तमाशा,
ये दिल की चीज़ भी किस क़दर बिकने लगी है।
~ राजेश कुट्टन ‘मानव’

Leave a comment