कहाँ तक चलोगे, थकाना पड़ेगा
मुक़द्दर से भी टकराना पड़ेगा
जो सच देखना है, तो आईने में
ख़ुद अपने को आज़माना पड़ेगा
ये मंज़िल तो हर मोड़ पर बदलेगी
सफ़र को ही घर बनाना पड़ेगा
जो रिश्ते समय की धूल में खो गए
उन्हें याद से भी मिटाना पड़ेगा
ये दुनिया ख़रीद लेगी सब कुछ
ख़ुद को अगर बचाना पड़ेगा
जो दर्द मिला है, रखो सीने में
कभी हँस के भी जताना पड़ेगा
~ राजेश कुट्टन ‘मानव’

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