नामालूम सा एक लम्हा गुज़र गया,
जैसे किसी ने मेरा नाम लिया हो धीरे से,
और फिर… हवा में घोल दिया हो।
मेज़ पर रखा एक ख़त काँप उठा,
ना लिखा गया, ना फाड़ा गया —
बस वहीँ पड़ा रहा, मेरे जैसा।
शहर की सबसे हल्की बारिश आई थी आज,
और मैं उसी बूँद को तकता रहा
जो ना ज़मीन पे गिरी, ना आसमान में लौटी।
सोचता हूँ — क्या यादें भी मरती हैं?
या बस नए लिबास पहन लेती हैं,
और हमें ही पहचानने से इनकार कर देती हैं?
कभी-कभी लगता है…
मैं ज़िन्दा नहीं हूँ,
बस किसी की याद में टिका हुआ एक लम्हा हूँ।
~ राजेश कुट्टन ‘मानव’

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