या तो उसे हुस्न न देना, या हमें जुर्रत नहीं देना,
इश्क़ के मैदान में डर और फिर हिम्मत नहीं देना।
जिस्म को खुशबू की ज़ुबां दी, नज़र को रंग बख़्शे,
फिर हमारी आँख को उस पर कोई हसरत नहीं देना।
तू अगर साक़ी बना, तो जाम में हो आग भी कुछ,
फिर नशे की ख़ातिर एक ठंडी सी चाहत नहीं देना।
दिल को ताबीर की मंज़िल तक कभी पहुँचा तो देना,
साथ में रस्ते में फिर तन्हा कोई सूरत नहीं देना।
हमसे उस नग़्मे की तालीम न कर जो टूट जाए,
लब को आवाज़ देना पर उसे वहशत नहीं देना।
हमने कब माँगा है जन्नत की हवाएं रात भर,
बस कोई लम्हा हमारा हो, तो तल्ख़ी नहीं देना।
बेबसी की भी हदें हैं, तौहीन मत करना ख़ुदा,
इश्क़ दे देना अगर — कोई मोहलत नहीं देना।
रूह की लौ में भी जल जाएं अगर, शिकवा नहीं,
हक़ दिया जब दिल पे उसका फिर ज़ख़्म नहीं देना।
~ राजेश कुट्टन ‘मानव’

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