कहो, जो दिल में तूफ़ान है, चुप रह के क्या मिलेगा?
ये ख़ामुशी का वीरानापन, आख़िर कहाँ ले जाएगा?
बसे हैं लफ़्ज़ जो सीने में, वो कब तलक रह पाएँगे?
ये अश्क़ जो तहरीर बने, तो शायद कुछ समझाएगा।
कहीं न कहीं इक मोड़ पे, रूठा हुआ वक़्त बैठा है,
तुम बोलोगे तो टूटे लम्हा, फिर से सांसों में आएगा।
हर एक अधूरी दास्ताँ, इक खिड़की है रौशनी की,
जो तुमने खोला नहीं कभी, वो अब भी रस्ता दिखाएगा।
बुझी हुई इन साँसों में, इक शोला अभी बाक़ी है,
वो नाम जो अधरों से छूटा, रूह में फिर जगमगाएगा।
क़दम जो ठहरे रह गए, क्या मालूम किस डर से थे,
जहाँ लगे दिल को घर सा — वही सफ़र बन जाएगा।
न रुख़ हवाओं का थमा है, न वक़्त ठहरा है कहीं,
जो बात दिल में रह गई, वो साया बन के आएगा।
~ राजेश कुट्टन ‘मानव’

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