तुझे माफ़ नहीं कर पाऊँगा मैं,
ये अल्फ़ाज़ हैं — पर सज़ा ख़ुद को दूँगा मैं।
वो लम्हा जब तूने नज़रें चुरा ली थीं,
अब उम्र भर उसी पल में जियूँगा मैं।
तू पास था — मगर पास कभी न था,
इस फ़रेब को हर रोज़ पीयूँगा मैं।
जो भी कहा — तेरी बातों सा मीठा था,
पर हर सच को अंदर ही अंदर ग़लूँगा मैं।
कभी तू लौटे तो ये मत समझना, माफ़ किया,
बस इतनी सी बात पे ख़ामोश हो जाऊँगा मैं।
जिसने छीन ली थी मुझसे मेरी ख़ुशी,
उसी ग़म को अपना मक़ाम कर लूँगा मैं।
अब रौशनी नहीं — पर अंधेरे से दोस्ती है,
हर रात में एक नया सबक बुन लूँगा मैं।
अब शिकवा नहीं, अब कोई फ़रियाद नहीं,
बस अपने साए से सवाल कर लूँगा मैं।
तू गया — ये यक़ीन है, पर मैं बाकी हूँ,
इस यक़ीन से रोज़ सुबह कर लूँगा मैं।
~ राजेश कुट्टन ‘मानव’

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