कभी मैं एक चेहरा था, अब अक्स भी नहीं,
सब उजाला ले गए, बचा रस भी नहीं।
ना कोई रिश्ता रहा, ना दोस्त की सदा,
ख़ामोशियों में अब कोई अर्थ भी नहीं।
हर मोड़ पे जो ठहरे थे, नाम लेके चले,
वो लोग अब मिलते हैं — पर हर्फ़ भी नहीं।
जिस घर की चौखट ने मुझे देखा बड़ा,
अब वो भी है — मगर मेरा घर भी नहीं।
यादें भी जैसे थक गई हों मुझसे अब,
मैं ही था — अब वो भी मेरे साथ नहीं।
सब कुछ जो मैंने था किसी रोज़ बाँट दिया,
अब मैं बचा हूँ — पर कोई ‘मैं’ भी नहीं।
~ राजेश कुट्टन ‘मानव’

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