अब हम पे इल्ज़ाम अच्छा है

हम से बेहतर जब ढूँढ लिया, अब हम को बेहतर कहते हैं,
गुज़रे लम्हों का बोझ अब, हमारे ही सिर रखते हैं।

कल तक जिनकी ख़ामोशी में शिकवा-सा कुछ लगता था,
आज वही हमसे मिलकर फिर मीठे जज़्बात कहते हैं।

जो रुकते नहीं थे मौसम की एक भी सर्द हवा पे कभी,
अब हमारी यादों को वो ही वक़्त की बरसात कहते हैं।

हमने जिनको देखा था यूँ जैसे रूह की एक माँग हों,
अब वो महफ़िल में हमको, बस इक मज़मून-सात कहते हैं।

जिससे रोशन था दिल का शहर, जिस पर नाज़ किया करते थे,
अब वो चुप रह जाएँ तो लोग, इसको ही शराफ़त कहते हैं।

और हमें जो ठुकरा आए थे इक बार वक़्त के मोड़ पे,
अब लौट के आकर साहब — ‘तू अब भी वैसा हो’ कहते हैं।

~ राजेश कुट्टन ‘मानव’


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