मैं ही सफ़र, मैं ही दूरी का दर्द,
मैं ही थकन, मैं ही राहों का मर्म।
मैं ही सवाल — “कहाँ जा रहा हूँ?”
मैं ही जवाब — “ख़ुद से बचा रहा हूँ।”
मैं ही हूँ हर मोड़ की पेचीदगी,
मैं ही हूँ छाँव, मैं ही तपिश की सदी।
मैंने ही खुद को हर बार थामा,
और हर बार खुद से ही दूर भागा।
एक साया था — जो मेरे साथ चला,
मैंने सोचा कोई और है…
पर वो मेरा ही डर था,
जो उसकी की आवाज़ में बोलता रहा।
जब शाम भी थक के चुप हो गई,
और रात ने दस्तक देना छोड़ दिया,
मैंने चुपचाप खुद से पूछा —
“तू कहाँ था, जब सब छोड़ गए?”
सारा जग — नाम, शोहरत, रिश्ते, रस्में,
सब व्यर्थ गया…
क्योंकि जिससे मिलना था, वही सबसे दूर था — ‘मैं।’
अब जो रुक कर साँस ली —
तो एहसास हुआ:
“मैं ही सफ़र था, मैं ही सफ़र की मंज़िल।”
(विस्तारित रूप)
मैं ही सफ़र, मैं ही रस्ता, मैं ही उलझन का निशाँ,
मैं ही चुप्पी की सदा, मैं ही बिखरा सा मकाँ।
हर मोड़ पे जो खड़ा मिला —
वो कोई और नहीं, मेरा ही डर था… मेरा ही गुरूर था… मेरा ही ‘मैं’ था।
रात जब रुक जाती थी मेरी पलकों के किनारे,
और नींद डर जाती थी मेरे सवालों से,
तब भी कोई था जो मेरी साँसों में बोलता था —
“लौट चल… मंज़िल तुझमें ही है।”
जो भी चाहा — पाया, जो भी खोया — वक़्त ले गया,
पर जो रहा — वो मैं था,
ना मुकम्मल… ना फना, बस अधूरा…
क्योंकि ख़ुद से मिलने की हिम्मत कभी की ही नहीं।
लोगों ने बताया — खुदा किताबों में है, मस्जिद में है, मंदिर में है, दरगाहों में है…
मैं हर दर पर गया, हर रिवायत निभाई,
पर जो कभी सिर झुकाकर दिल में झाँका होता,
तो एक रौशनी वहीं से निकलती।
अब जब ठहर गया हूँ — हर दौड़ से बाहर,
हर आवाज़ से दूर, हर चाहत से अलग,
तो समझ पाया हूँ —
मैं ही सफ़र, मैं ही सफ़र की थकान,
मैं ही राही, मैं ही रहमत की पहचान।
~ राजेश कुट्टन ‘मानव’

Leave a comment