तुम भी तो कहीं ठहरे होगे,
दिल तुम्हारा भी तो टूटा होगा।
वक़्त ने सब कुछ बदला लेकिन,
कुछ तुम्हें भी तो झकझोरा होगा।
हम भी अक्सर चुप रहे बेमतलब,
पर ये सच है — तुमने भी तो छोड़ा होगा।
मैं अकेला ही नहीं था उस मोड़ पे,
तेरा साया भी तो मुड़ा होगा।
ख़ामुशी का इल्ज़ाम है मुझ पर,
पर तुमने भी कब कुछ बोला होगा?
मैंने कब खुद को बचाया तुमसे,
तुमने भी दिल अपना खोला होगा।
अब जो मिलते नहीं हैं ख़्वाबों में,
कहीं तुम्हें भी रुकना पड़ा होगा।
~ राजेश कुट्टन ‘मानव’

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