जिसने नाम तक लेने का हक़ नहीं दिया,
मैं उसी को हर मिसरे में बे-सदा रखता हूँ।
बात करता हूँ हवाओं से यूँ अक्सर अब,
जैसे उसके शहर का ही पता रखता हूँ।
हर ग़ज़ल में वो कहीं तो मौजूद रहता है,
मैं हर ख़याल में उसे चुपचाप बसा रखता हूँ।
लोग समझते हैं कि अब मैं उससे दूर हूँ,
क्या बताऊँ, मैं उसे साँसों में पिरोया रखता हूँ।
मुस्कुराहट भी मेरी उसकी अमानत है कहीं,
मैं जो भी ओढ़ता हूँ, उसका लहजा रखता हूँ।
अब कोई शिकवा नहीं, कोई शिकायत भी नहीं,
मैं बस अपनी तहरीरों में वफ़ा रखता हूँ।
यूँ न पढ़ मेरी खमोशी को हल्के से कभी,
मैं हर ख़ामोश हरफ़ में एक सज़ा रखता हूँ।
~ राजेश कुट्टन ‘मानव’

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