पाँव बेच कर सफ़र खरीदे थे एक रोज़,
अब जहाँ बैठा हूँ — वहाँ रस्ता नहीं रहता।
जिस्म का सौदा भी इक दिन समझ में आया,
जब रुह बिक चुकी थी, कोई सौदा नहीं रहता।
मैं बिक चुका था — मगर क़ीमत न जान पाया,
अब हर निगाह पूछे — तू इतना क्यों नहीं कहता?
कुछ ख्वाब थे जो पलकों में पलते थे चुपचाप,
अब वो भी पूछते हैं — क्या मेरा कोई हिस्सा नहीं रहता?
जिस मोड़ से लौटा हूँ मैं ख़ुद को छोड़कर,
उस मोड़ पर मेरा साया भी तन्हा नहीं रहता।
मैं क्या कहूँ कि अब भी साँस आती है मुझे,
जब दिल ही बेच डाला — तो ज़िंदा कौन रहता?
~ राजेश कुट्टन ‘मानव’

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