मैं ख़ुद को छोड़ के निकला था कुछ बदलने को,
मगर जो लौट कर आया — वो भी मैं नहीं था।
हर आईने ने कहा — तुझ में कुछ तो है बाक़ी,
पर जो नज़र से गिरा था, वो कभी उठा नहीं था।
उसे शिकायत थी मेरी ख़ामोशियों से बहुत,
उसे क्या मालूम — मैं यूँ ही चुप नहीं था।
ज़बान सी गई थी बस जीने के फ़र्ज़ में,
वरना मैं बेजुबाँ, बेअसर नहीं था।
तेरे सवाल में तल्ख़ी थी, मेरी बात में राख,
ये रिश्ता जल तो गया, पर बुझा नहीं था।
मैं सोचता रहा — मैं कितना गलत था आख़िर?
सच ये है कि मैं बस तेरे क़ाबिल नहीं था।
~ राजेश कुट्टन ‘मानव’

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