कभी किसी की नज़रों में ठहर जाना भी बहुत था,
एक झलक को तरसना — वो पागलपन भी बहुत था।
हम ने तो रिश्तों को साँसों की तरह चाहा था,
मगर किसी के लिए इतना होना भी क्या कम था?
बातें जो होठों तक आईं, दिल ही में रह गईं,
कुछ ख़्वाब कहे बिना टूटे — अफ़सोस बहुत था।
वो साथ रहा, पर जैसे दूरियों में बसा था,
कभी पास था, कभी जैसे ख़्वाब सा धुँधला था।
वो देखता रहा हमें जैसे कोई मौसम बीत रहा हो,
हम थे वही, मगर वक़्त का चेहरा कुछ और था।
अब न शिकवा है, न उम्मीद का कोई नाम बाक़ी,
जिसे जाना ही था, उसका जाना भी बहुत था।
~ राजेश कुट्टन ‘मानव’

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