वो वक़्त अब भी साँस लेता है कहीं मुझ में
मैं जिसको भूल चुका, वो जीता है कहीं मुझ में

जो लम्हे रूह में पानी की तरह उतरे थे
अब उनसे धुआँ सा रिसता है कहीं मुझ में

न उसने छोड़ा था, न मैंने बचाया कुछ
मगर वो रिश्ता अब भी पलता है कहीं मुझ में

वो हँसी, वो बातें, वो खामोशियों की गूँजें
कभी-कभी कोई आवाज़ रुकती है कहीं मुझ में

मैं अब न उसका हूँ, न वो मेरी बातों में
फिर भी इक स्वाद पुराना सा रहता है कहीं मुझ में

हमने तो राख समझ के उड़ जाने दिया उसे
मगर वो आग अभी तक जल रही है कहीं मुझ में

~ राजेश कुट्टन ‘मानव’

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प्रतिशोध की अग्नि में जन्मा यह काव्य, शक्ति नहीं—स्मृति की राजनीति रचता है। यह कथा है उस पराजित पुरुष की, जिसने युद्ध तलवार से नहीं, इतिहास की दिशा मोड़कर लड़ा। महाकाव्य पूछता है—यदि विजेता बदल जाए, तो धर्म का चेहरा कौन तय करेगा?.

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इतिहास केवल विजेताओं द्वारा लिखा गया दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि पराजितों की राख में दबी हुई एक दूसरी पुस्तक भी होती|

प्रतिशोध की अग्नि में जन्मा यह काव्य, शक्ति नहीं—स्मृति की राजनीति रचता है। यह कथा है उस पराजित पुरुष की, जिसने युद्ध तलवार से नहीं, इतिहास की दिशा मोड़कर लड़ा। महाकाव्य पूछता है—यदि विजेता बदल जाए, तो धर्म का चेहरा कौन तय करेगा?