वो वक़्त अब भी साँस लेता है कहीं मुझ में
मैं जिसको भूल चुका, वो जीता है कहीं मुझ में
जो लम्हे रूह में पानी की तरह उतरे थे
अब उनसे धुआँ सा रिसता है कहीं मुझ में
न उसने छोड़ा था, न मैंने बचाया कुछ
मगर वो रिश्ता अब भी पलता है कहीं मुझ में
वो हँसी, वो बातें, वो खामोशियों की गूँजें
कभी-कभी कोई आवाज़ रुकती है कहीं मुझ में
मैं अब न उसका हूँ, न वो मेरी बातों में
फिर भी इक स्वाद पुराना सा रहता है कहीं मुझ में
हमने तो राख समझ के उड़ जाने दिया उसे
मगर वो आग अभी तक जल रही है कहीं मुझ में
~ राजेश कुट्टन ‘मानव’

Leave a comment