किसी के पास था, फिर भी नहीं था
मैं अपने आप में था, पर कहीं नहीं था
जो दोस्ती थी, वो लफ़्ज़ों में रह गई बस
जो दिल से जुड़ा हो, वो कहीं नहीं था
वो साथ चलता रहा सारे रास्तों पर
मगर जो चल सके भीतर, वही नहीं था
मैं हर ख़ुशी में शामिल रहा मुस्कुरा के
मगर जो बात थी, वो तो कही नहीं था
बहुत से नाम थे रिश्तों की भीड़ में
मगर जो नाम मेरा था — वही नहीं था
कभी जो लोग मेरी रूह तक पहुँचे थे
वो पास आए, मगर अब वही नहीं था
कभी किसी ने पूछा ही नहीं हाल मेरा
“तू ठीक है?” ये भी सवाल नहीं था
~ राजेश कुट्टन ‘मानव’

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