किसी के पास था, फिर भी नहीं था
मैं अपने आप में था, पर कहीं नहीं था

जो दोस्ती थी, वो लफ़्ज़ों में रह गई बस
जो दिल से जुड़ा हो, वो कहीं नहीं था

वो साथ चलता रहा सारे रास्तों पर
मगर जो चल सके भीतर, वही नहीं था

मैं हर ख़ुशी में शामिल रहा मुस्कुरा के
मगर जो बात थी, वो तो कही नहीं था

बहुत से नाम थे रिश्तों की भीड़ में
मगर जो नाम मेरा था — वही नहीं था

कभी जो लोग मेरी रूह तक पहुँचे थे
वो पास आए, मगर अब वही नहीं था

कभी किसी ने पूछा ही नहीं हाल मेरा
“तू ठीक है?” ये भी सवाल नहीं था

~ राजेश कुट्टन ‘मानव’

4 responses to “मैं अपने आप में था”

  1. बहुत सुन्दर लेखन कला है

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  2. बहुत सुंदर सृजन 👌

    Liked by 1 person

    1. आपकी सराहना हर बार एक मुस्कान छोड़ जाती है। ऐसे ही जुड़े रहिए, बहुत अच्छा लगता है।

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प्रतिशोध की अग्नि में जन्मा यह काव्य, शक्ति नहीं—स्मृति की राजनीति रचता है। यह कथा है उस पराजित पुरुष की, जिसने युद्ध तलवार से नहीं, इतिहास की दिशा मोड़कर लड़ा। महाकाव्य पूछता है—यदि विजेता बदल जाए, तो धर्म का चेहरा कौन तय करेगा?.

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प्रतिशोध की अग्नि में जन्मा यह काव्य, शक्ति नहीं—स्मृति की राजनीति रचता है। यह कथा है उस पराजित पुरुष की, जिसने युद्ध तलवार से नहीं, इतिहास की दिशा मोड़कर लड़ा। महाकाव्य पूछता है—यदि विजेता बदल जाए, तो धर्म का चेहरा कौन तय करेगा?