वजूद कोई साये में ढलता हुआ लगे
मैं ज़िंदा हूँ, मगर कहीं कमतर हुआ लगे
कभी जो नाम था लफ़्ज़ों में साँस जैसा
अब एक बंद किताब में बिखरा हुआ लगे
मैं जो भी हूँ, वो मुझ-सा नहीं रहा शायद
ये आईना भी अब मुझे तन्हा हुआ लगे
धूप-छाँव की बातें हैं हर किसी के साथ
मैं सिर्फ़ अँधेरों में ही देखा हुआ लगे
मैं वक़्त से सवाल करने गया था कल
वो हँस के बोला — सब कुछ जलता हुआ लगे
हर मोड़ पर ठहरना है जैसे फ़र्ज़ मेरा
मैं अपनी ही राह में उलझा हुआ लगे
जो ख्वाब मेरी नींद में था किसी ज़माने
अब और की आँखों में सजता हुआ लगे
~ राजेश कुट्टन ‘मानव’

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